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देवगढ़ का किला, छिंदवाड़ा (म.प्र.) - एक किले की अनकही कहानी | Untold Story of Devgarh Fort, Chhindwara, Madhya Pradesh

देवगढ़ किला जिला मुख्यालय छिंदवाड़ा से 42 किलोमीटर की दूरी पर विकास खंड मोहखेड़ के देवगढ़ ग्राम में 650 मीटर ऊंची एक पहाड़ी पर यह किला स्थित है जो देवगढ़ किले के नाम से जाना जाता है।

यह किला घने जंगलों के साथ ही चारों ओर एक गहरी खाई से घिरा हुआ है।

यह किला 16वीं सदी में गोंड राजाओं द्वारा निर्मित माना जाता है। देवगढ़ का कोई प्रत्यक्ष लिखित इतिहास प्राप्त नहीं होता है।  परंतु बादशाहनामा व अन्य मुगल साहित्य में देवगढ़ की चर्चा की गई है। अकबर के समय देवगढ़ पर जाटवा शाह राज्य करता था।

आइए हम इसके पूर्व के इतिहास को खंगालने का प्रयास करते हैं -

फारसी इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार सन् 1398 ईसवी  में खेरला राज्य पर राजा नरसिंह राय राज्य करता था। जो काफी वैभवशाली और प्रतापी शासक था। जिसका इस क्षेत्र के अधिकांश गोंडवाना प्रदेश पर अधिकार था। निश्चित ही देवगढ़ एवं हरिया गढ़ (वर्तमान हिरदागढ) का क्षेत्र इस राजा के अधीन किसी सरदार या सामंत द्वारा शासित रहा है।

संभव है इस क्षेत्र में गौली सत्ता रही हो। गौली सत्ता के यह छोटे बड़े राजा या सरदार अर्थात सामंत समय अनुसार बड़े साम्राज्य के उलट फेर में यथा स्थिति शक्तिशाली शासक की अधीनता स्वीकार कर लेते थे। खेरला राज्य के राजा नरसिंह राय ने लगभग 38 वर्ष खेरला पर राज्य किया। इस समय खेरला राज्य बहमनी राज्य के शासकों के अधीन था। सन 1433 ईस्वी में मालवा के सुल्तान के आक्रमण के फल स्वरुप खेरला राज्य का पतन हो गया। 

राज्य के अधीनस्थ क्षेत्र मालवा सुल्तान के अधिकार में आ गए। माना जा सकता है कि हरिया गढ़ व देवगढ़ क्षेत्र भी मालवा राज्य के अधीन हो गया। इसी बीच गढ़ाकोटा के गोंड शासक के रूप में राजा संग्राम शाह एक शक्तिशाली शासक के रूप में उभर कर आया।  जिसने सन् 1480 ईस्वी से सन् 1542 ईसवी तक 52 गढ़ और 57 परगनों को जीत कर अपने राज्य का विस्तार किया। जिसमें चौरई, चांदा गढ़ (वर्तमान चंद्रपुर महाराष्ट्र) गुन्नौर गढ़ आदि शामिल रहे हैं। और परगनों में तब हरिया गढ़ का प्रथम उल्लेख मिलता है। 

संग्राम शाह की मृत्यु के उपरांत दलपत शाह 1548 तक गढ़ कटंगा का राजा रहा। उसकी मृत्यु उपरांत रानी दुर्गावती के शासनकाल में सन् 1564 ईसवी तक देवगढ, गढ़ कटंगा के गोंड शासक रानी दुर्गावती के अधीन रहा। 

सन् 1564 ईस्वी में मुगल सम्राट अकबर के सूबेदार आसफखां द्वारा गढ़ कटंगा पर आक्रमण कर उसे अकबर के राज्य में मिला लिया। अब देवगढ़ व हरिया गढ़ का क्षेत्र भी अकबर के साम्राज्य के अधीनस्थ क्षेत्र माने जाने लगा। राजा संग्राम शाह की मृत्यु के उपरांत गढ़ा के गोंड राजाओं के पतन के फल स्वरूप छोटे छोटे राजा या सरदार स्वतंत्र होने लगे।


इस समय देवगढ़ की राजधानी हरिया गढ़ में गौली जाति के रनसूर एवं घनसूर नामक दो भाई शासन करते थे। इनके यहां जाटवा शाह नामक एक गोंड कर्मचारी कार्यरत था, जो काफी शक्तिशाली था। जन श्रुति है कि किले का दरवाजा जिसे कई कर्मचारी मिलकर लगाते थे, उसे जाटवा शाह ने अकेले ही उठाकर लगा दिया। उसकी ताकत के किस्सों से घबराकर रनसूर एवं घनसूर गौली सरदारों ने षड्यंत्र कर, दशहरे के अवसर पर चंडी देवी की पूजा की बलि के अवसर पर, एक लकड़ी की तलवार से भैंसे की बलि का आदेश दिया।

जाटवा शाह ने अपने शक्तिशाली वार से भैंसे की बलि दे दी, एवं तत्काल ही उसी तलवार से रनसूर एवं घनसूर गौली सरदारों की हत्या कर दी। वह लकड़ी की तलवार आज भी ग्राम कटकुही के पास ग्राम उमरघोड़ा विकासखंड जुन्नारदेव में किसी के पास मौजूद है। हरिया गढ़ (वर्तमान हिरदागढ़) के आसपास गांवों में गौलियों की अधिकांश बस्तियां निवासरत हैं, एवं लकड़ी की तलवार की मौजूदगी के किस्से हिरदागढ़ के आसपास के गांवों में प्रचलित होने से, तथा चंडी देेेवी मंदिर आज भी है। इससे यह तथ्य स्पष्ट होता है की जाटवा शाह द्वारा रनसुर एवं घनसूर गौली सरदारों की हत्या की घटना, हरिया गढ़ किले में घटित हुई थी।  

जाटवा शाह द्वारा हरिया गढ़ को अपने अधिकार में लेने के कुछ समय बाद, उसने सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से अपनी राजधानी हरिया गढ़ से देवगढ़ स्थानांतरित कर दी, और देवगढ़ से अपना शासन प्रारंभ किया।


इस प्रकार हरियागढ़ व देवगढ़ से गौली राज सत्ता का अंत कर, जाटवा शाह ने गोंड राज सत्ता की स्थापना की। दूरदर्शी, शक्तिशाली एवं कुशल सेनानायक राजा जाटवा शाह ने देवगढ़ किले के अलावा पाटन सावंगी एवं नागपुर आदि किलों का भी निर्माण करवाया। साथ ही साथ उसने चारों को अपने राज्य का विस्तार भी किया। वह सन् 1570 ईस्वी में देवगढ़ की गद्दी पर बैठा। लगभग 10 वर्ष वह अपनी स्थिति मजबूत करने में लगा रहा। अपने आसपास के क्षेत्र और परगनों को अपने अधीनस्थ कर उनसे कर लेने लगा। 

जाटवा शाह ने अपने बाहुबल से गढ़ा शासकों के लगभग आधे क्षेत्र तथा खेरला राज्य के बहुत से क्षेत्र एवं नागपुर तक अपना अधिकार कर लिया था। इस प्रकार जाटवा शाह ने देवगढ़ को एक स्वतंत्र राज्य सत्ता के रूप में स्थापित किया।  

राजा जाटवा शाह ने हरिया गढ़ से अपनी राजधानी देवगढ़ स्थानांतरित कर, देवगढ़ के किले का योजनाबद्ध तरीके से निर्माण करवाया एवं किले के चारों तरफ खाइयों का भी निर्माण करवाया।

सन् 1564 ईसवी से गढ़ा का संपूर्ण क्षेत्र सम्राट अकबर द्वारा अपने साम्राज्य के अंतर्गत मिला दिए जाने पर सम्राट अकबर ने इस क्षेत्र पर नियंत्रण हेतु अपने सूबेदार नियुक्त किए। अबुल फजल लिखता है कि सम्राट अकबर के शासन के 28वें वर्ष सन 1584 ईसवी में देवगढ़ के राजा जाटवा शाह ने मोहम्मद जामिन को मार डाला। मोहम्मद जामिन, मोहम्मद यूसुफ खान का चचेरा भाई था। मोहम्मद जामिन ने बिना सम्राट अकबर की अनुमति के देवगढ़ पर सन् 1584 ई. में आक्रमण कर दिया। 

जाटवा शाह ने मोहम्मद जामिन का स्वागत किया। उसको नजर भेंट की एवं भविष्य में उसके आदेशों को पालने का वचन दिया। परंतु मोहम्मद जामिन ने करार का उल्लंघन कर लालच और मोह के मद में अंधा होकर सेना सहित हरिया गढ़ पर आक्रमण कर दिया। और हरिया गढ़ को उसने जमकर लूटा। 

शायद सन 1584 ईसवी का यह आक्रमण ही हरिया गढ़ के पतन की कहानी है। हरिया गढ़ लूटने के पश्चात वापस लौटते समय मोहम्मद जामिन ने देवगढ़ को भी जमकर लूटा, और जंगली मार्ग से वापस हुआ। वापसी में जंगली मार्ग में जाटवा शाह ने मोहम्मद जामिन पर आक्रमण कर उसे मार डाला।

राजा जाटवा शाह ने मुगल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार कर लिया, परंतु गढ़ा शासकों के अधीन वह कभी नहीं रहा। आईने अकबरी में लिखा है कि जाटवा शाह सन् 1590 ई. में राज्य करता था।
 
खेरला सरकार के वर्णन के साथ ही जाटवा शाह का वर्णन इस प्रकार किया गया है - 

"खेरला सरकार के पूर्व में जाटवा शाह नामक जमींदार जिसके पास 2000 घुड़सवार, 50000 पैदल पलटन और 100 हाथी है, निवास करता है। वहां के समस्त निवासी गोंड हैं। इसके देश में जंगली हाथी पाए जाते हैं। यह लोग सदा सर्वदा मालवा के राजाओं के अधीन रहते थे। पहले वह गढ़ा के शासक के अधीन थे।"

"मेमोरीज ऑफ़ जहांगीर" में जाटवा के संबंध में लिखा है कि "सम्राट जहांगीर अपने शासन के 11वें वर्ष सन् 1616 ईस्वी में अजमेर से मालवा आया था। मालवा की सीमा पार करते समय जाटवा शाह ने बादशाह को दो हाथी भेंट स्वरूप दिए।" 


इससे स्पष्ट है कि जाटवा शाह एक प्रभावशाली राजा था। इसकी स्वयं की टकसाल थी। जिसमें महाराजा जाटवा शाह के नाम से तांबे के सिक्के ढाले जाते थे। राजा जाटवा शाह ने 50 वर्षों तक अर्थात सन् 1620 ईस्वी तक राज्य किया।


राजा जाटवा शाह की सन् 1620 ईस्वी मेंं मृत्यु हो गई। पांढुर्णा में राजा जाटवा शाह के नाम का वार्ड आज भी है। राजा जाटवा शाह के सात पुत्र थे। उसका तीसरा पुत्र कोकशाह देवगढ़ की गद्दी का उत्तराधिकारी हुआ। 

कोकशाह ने सन् 1620 ईस्वी से सन् 1640 ईसवी तक देवगढ़ पर राज्य किया। कोकशाह के शासनकाल में सन् 1636 ईस्वी में सम्राट शाहजहां के कार्यकाल के समय, बुरहानपुर का सूबेदार खानदौरान देवगढ़ पर आक्रमण के लिए आया। उसने नागपुर के किले पर अधिकार कर लिया। तब देवगढ़ से राजा कोकशाह नागपुर आया। तथा 170 हाथी एवं डेढ़ लाख रुपया खान दौरान को देकर सुलह कर लिया। साथ ही नागपुर का किला मुगलों से वापस ले लिया।

राजा कोकशाह की मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र जाटवा द्वितीय देवगढ़ का शासक बना। उसने सन् 1640 ईसवी से सन् 1657 ईस्वी तक शासन किया।  

सम्राट शाहजहां के शासनकाल के दौरान, बुरहानपुर के सूबेदार औरंगजेब के निर्देश पर, सन् 1655 ईसवी में बरार के नाजिम मिर्जा खान को देवगढ़ पर आक्रमण कर, कर वसूलने भेजा गया। तब जाटवा द्वितीय ने 20 हाथी और संपूर्ण कर देकर समझौता किया। 

जाटवा द्वितीय की मृत्यु उपरांत उसका पुत्र कोकशाह द्वितीय के नाम से देवगढ़ की गद्दी पर बैठा। उसने सन् 1657 ईस्वी से सन् 1687 ईस्वी तक राज्य किया। सम्राट औरंगजेब ने सन् 1667 में दिलेर खां को कर वसूल करने भेजा। तब कोक शाह द्वितीय ने 15 लाख रुपये कर के जमा किया। एवं भविष्य में कल जमा करते रहने का वचन दिया।

कोकशाह द्वितीय के निधन के उपरांत, उसका पुत्र बख्त शाह देवगढ़ की गद्दी पर बैठा। इसने सन् 1687 ईस्वी से सन् 1706ई. तक देवगढ़ पर शासन किया। जब बख्त शाह गद्दी पर बैठा, तो इसके भाई दीनदार शाह ने, उसे गद्दी से हटाकर स्वयं देवगढ़ का राजा बन गया। तब बख्त शाह ने दिल्ली जाकर सम्राट औरंगजेब से मदद मांगी। तब औरंगजेब ने इस्लाम स्वीकार करने की शर्त पर मदद की। और उसका नाम बख्त शाह से बख्त बुलंद रख दिया। 

बख्त शाह ने मुसलमानों में शादी ब्याह ना करने की शर्त पर इस्लाम स्वीकार किया। बख्त बुलंद दिल्ली से सेना लेकर देवगढ़ लौटा। और पुनः देवगढ़ किले को जीतकर शासक बन बैठा।

देवगढ़ के गोंड राजवंश में जाटवा शाह प्रथम के पश्चात राजा बख्त बुलंद सबसे शक्तिशाली राजा हुआ। बख्त बुलंद ने अपने शासनकाल में छिंदवाड़ा, सिवनी ,बैतूल, होशंगाबाद, बालाघाट,भंडारा, वर्धा, चांदा, नागपुर तक अपने राज्य का विस्तार किया। राजा बख्त बुलंद को ही नागपुर बसाने का श्रेय प्राप्त है


सन् 1706 ईस्वी में राजा बख्त बुलंद की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र चांद सुल्तान देवगढ़ की गद्दी का उत्तराधिकारी हुआ। उसने अपनी राजधानी देवगढ़ से नागपुर स्थानांतरित कर दी। तब से ही देवगढ़ में यह कहावत चर्चित है कि " देवगढ़ खसला, नागपुर बसला "। 

चांद सुल्तान ने सन् 1706 ईस्वी से सन् 1739 ईस्वी तक नागपुर से ही देवगढ़ आदि समस्त क्षेत्रों पर शासन किया। सन् 1739 ईस्वी से सन् 1742 ईस्वी तक बली शाह और बुरहान शाह नाम मात्र के, देवगढ़ के शासक रहे। परंतु शासन प्रबंध मराठों के हाथों में रहा। इसके पश्चात सन् 1803 ई. तक मराठों का शासन रहा। सन् 1803 से सन् 1853 ई. तक मराठों का शासन नाममात्र का रहा, परन्तु वास्तविक सत्ता अंग्रेजों के हाथ में रही। सन् 1853 ई. में राजा रघुजी भोंसले(तृतीय) की निःसंतान मृत्यु के कारण अंग्रेजों ने राज्य जप्त कर लिया। संभवतः मि. डब्ल्यू. रामसे छिंदवाड़ा का प्रथम प्रबंधक नियुक्त किया गया।

हालांकि देवगढ़ के किले का निर्माण राजा जाटवा शाह प्रथम ने करवाया था। आसपास क्षेत्रों में 800 कुआं, 900 बावली का निर्माण करवाया था राजा जाटवा शाह ने। परंतु देवगढ़ के किले को मजबूती प्रदान की राजा बख्त बुलंद ने। राजा बख्त बुलंद जब दिल्ली जाकर सम्राट औरंगजेब से सहायता प्राप्त करने गया। तब उसने वहां मुगल शिल्प कला के किलों की भव्यता से आकर्षित हुआ। और वापस देवगढ़ आने पर, उसने किले में महत्वपूर्ण परिवर्तन कर मुगल कालीन शैली के अनुरूप किले का मजबूती से निर्माण करवाया।

किसी समय इस क्षेत्र का सिरमौर रहा देवगढ़ का यह आलीशान किला, वर्तमान में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। घाटीदार मार्ग से चढ़ते हुए किले का सिंह द्वार सामने आता है, जो मजबूत पत्थरों से बना है एवं वर्तमान में अच्छी स्थिति में है। पुनः पत्थरों की सीढ़ियों का घुमावदार रास्ता और दूसरा कमानीदार द्वार आता है। आगे बढ़ने पर देवगढ़ के किले के अंदर पहुंचते हैं। 

शकिले के अंदर एक नगारखाना जो तिमंजिला है। पास ही एक तालाब नुमा टांका है, जिसमें वर्ष भर पानी भरा रहता है। इसे मोती टांका कहते हैं। इसी प्रकार हाथीखाना, कचहरी, राजा की बैठक, बादल महल तथा खजाना आदि दर्शनीय है।    

दो अन्य मित्रोँ के साथ, सन् 1972 ईस्वी में देवगढ़ भ्रमण के दौरान, राजा की बैठक दरबार हाल में, राजा के लिए  पत्थर से निर्मित एक सिंहासन था। वास्तव में यह एक नक्काशी दार कुर्सी, जो पत्थर की बनी हुई थी। संभवतः जिस पर राजा बैठा करते थे। परंतु वर्तमान में अब वहां नक्काशीदार पत्थरनुमा कुर्सी का वह सिंहासन वहां नहीं है।

देवगढ़ ग्राम के समीप बहने वाले नाले के पास चट्टानों स्थित चट्टानों पर कुछ देवी देवताओं के शैल चित्र उकेरे गए हैं। एक चट्टान में अष्टभुजा रणचंडी का शैल चित्र उकेरा हुआ है। आसपास क्षेत्र के लोग कुलदेवी के रूप में यहां पूजा करते हैं। यहां चैत्र और क्वांर माह की नवरात्रि में मेला भरता है।

जिस देवगढ़ ने अतीत में कभी इतिहास रचा था। आज वह खुद इतिहास बनकर रह गया है। जहां के घने जंगलों में कभी हाथियों की चिंघाड़ गूंजा करती थी, आज वहां एक भी हाथी नहीं है।

ऐसा वीरान हो गया है देवगढ़ !!

                                   (देवगढ़ की एक बावली )


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