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श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर, गुजरात (Shree Somnath Jyotirlinga Temple, Gujarat)

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर बहुत ही प्राचीन ज्योतिर्लिंगों में से एक है। भारतीय संस्कृति में बारह ज्योतिर्लिंगों का दर्शन एवं पूजन अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। 

माना जाता है कि जब संसार की उत्पत्ति हुई होगी तब से ही यह ज्योतिर्लिंग स्थापित है जो प्राणीमात्र के कल्याण के लिए अवतरित होकर भूगर्भ में स्थापित हो गए थे।

गुजरात में स्थापित प्रसिद्ध श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर अरब सागर के तट पर स्थित है। श्री प्रभु के चरणों को स्पर्श करता हुआ अरब सागर भव्यता दर्शाता है किंतु श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर क्षेत्र का सागर जल बहुत ही शान और निर्मल दृश्य उत्पन्न करता है। यह सभी अलौकिक भव्य मंदिर और सागर की देखने योग्य है।

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर का सोमनाथ नाम कैसे हुआ की कहानी :-


श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर की धार्मिक कथाओं/कहानियों में वर्णन है की प्राचीन काल में यशस्वी राजा जिनका नाम दक्ष था। जिन्हें जनसामान्य में दक्ष-प्रजापति के नाम से भी जानते हैं। वह राज किया करते थे। राजा दक्ष की सत्ताईस बेटियां थी। जिन्हें पिता दक्ष बहुत स्नेह करते थे एवं सभी बेटियों का विवाह देवताओं से करवाना चाहते थे। राजा दक्ष ने सभी सत्ताईस बेटियों का विवाह चंद्रदेव से एक साथ कर दिया था।

कुछ समय तक तो सब खुशी पूर्वक चलता रहा लेकिन चंद्रदेव का प्रेम व स्नेह दक्ष की एक पुत्री रोहिणी से अत्यधिक होने लगा। इस भेदभाव से दक्ष की दूसरी सभी बेटियां अलगाव व नाराज हो गई। सभी बेटियों ने साथ मिलकर इस विषय में पिता से शिकायत कर दी।

राजा दक्ष द्वारा अपने प्रिय दमाद चंद्र को बहुत समझाया गया कि वे दक्ष की सभी बेटियों के साथ न्याय करें एवं उचित व सामान्य व्यवहार करें। किंतु चंद्रदेव नहीं मानी चंद्रदेव का प्रेम पूर्ववत रोहिणी के प्रति की रहा। इससे नाराज होकर राजा दक्ष ने चंद्र को श्राप दे दिया।

राजा दक्ष द्वारा चंद्र को राजयक्ष्मा अर्थात क्षय रोग का श्राप दिया गया। इस रोग में चंद्र के तेज का श्रेय या शक्ति सामर्थ्य कम होने का श्राप लगा।

चंद्र चूंकि एक अग्रणी देवता थे। तो सभी देवताओं द्वारा भगवान ब्रह्मा से प्रार्थना की गई कि श्राप से चंद्रदेव को मुक्त किया जाए।

बार-बार की जा रही प्रार्थनाओं से ब्रह्मदेव श्राप मुक्ति का उपाय बताने राजी हुए। और देवताओं को श्राप से मुक्त होने का उपाय बताया कि प्रभास तीर्थ स्थान पर एकांत में ध्यान लगाकर भगवान शिव की प्रतिष्ठा करें। घोर तपस्या कर श्री प्रभु को प्रसन्न करें। श्री प्रभु ही प्रसन्न होकर चंद्रदेव को श्राप मुक्त कर सकते हैं। चंद्रदेव द्वारा यथापूर्वक घोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया गया व श्राप मुक्त हुए।
चंद्रदेव को सोम भी कहा जाता है। इसलिए इस शिवलिंग का नाम सोमेश्वर श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पड़ा। पौराणिक काल में ज्योतिर्लिंग को सोमेश्वर ज्योतिर्लिंग ही कहा जाता रहा है। जिसे अब श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से पहचाना जाता है।

स्कंद पुराण में भी इस स्थान का उल्लेख मिलता है। स्कंद पुराण में प्रभास तीर्थ के नाम से इस भव्य स्थान का प्रमाण है। श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को भैरव, कालाग्नि रुद्र, अग्नि आदि भी कहा जाता है।

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर की समृद्धि निरंतर हिंदु राजाओं द्वारा बढ़ाई गई है। श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर की समृद्धि विश्व विख्यात होने की वजह से बहुत से विदेशी आक्रमणकारी श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर  को क्षति पहुंचाकर स्वर्ण एवं रत्नों को लूटना चाहते थे।

प्रख्यात लेखक इब्न असीर ने एक जगह वर्णन किया है कि "मंदिर 56 स्तंभों पर टिका हुआ है और सारे स्तंभों में अनगिनत रत्न जड़े हुए हैं। शिवलिंग धरती के गर्भ में स्थित है। मंदिर का संचालन एवं पूजन के लिए कई गांव संगठित निर्णय लेते हैं। मंदिर में हीरे जवाहरातों का इतना प्रकाश है कि दिन-रात प्रकाश प्रज्ज्वलित रहता है। पूजन के लिए हजारों पंडित ब्राह्मण है। पूजा के लिए 200 मन सोने के 2 घंटे बजाए जाते हैं। जिसे सुन हजारों की संख्या में प्रतिदिन ग्रामवासी पूजन-अर्चन करने आते हैं।"

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर को सबसे बड़ी क्षति पहुंचाने वाला और मंदिर को अत्यधिक नष्ट करने वाला लुटरा महमूद गजनवी था। महमूद गजनवी ने भारत पर हमला कर सबसे ज्यादा क्षति श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर को पहुंचाई। महमूद गजनवी श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर के विश्व वैभव से पीड़ित था। एवं धन प्राप्ति की अपार लालसा के कारण उसने मंदिर को लूटने एवं नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

महमूद गजनवी एक विदेशी लुटेरा होने के साथ-साथ हिंदुओं का कट्टर विरोधी था। हिंदु जो कि संस्कृति एवं धन-धान्य से बहुत संपन्न थे। हिंदू देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से गजनबी को बहुत घृणा थी। 

गजनबी के गुप्तचरों द्वारा अरबों की संपत्ति, धन, हीरे-जवाहरात, स्वर्ण की जानकारी सुनकर महमूद गजनवी ने श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर को नष्ट करने व संपत्ति लूटने की योजना बनाई।

महमूद गजनवी कई बार भारी सेना बल लेकर हिंदू राजाओं से लड़ा। अनेक बार परास्त हुआ और भारी क्षति के साथ वापस लौटा। अंततः 11वीं शताब्दी में श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर को लूटने में सफल हो गया। उसने श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर व मंदिर परिसर को नष्ट कर दिया। अकूत संपत्ति हीरे जवाहरात और स्वर्ण लूट कर अपने साथ ले गया।

हजारों लोगों का खून बहाया गया। प्रतिमाओं को नष्ट किया गया। जिसके प्रमाण आज भी सोमनाथ में मिल जाते हैं। किंतु इन सभी कुकृत्यों का नुकसान भी गजनबी को झेलना पड़ा। हजारों की संख्या में उसके सैनिक और अनगिनत घोड़े मारे गए। बहुत सी लड़ाइयां हिंदू राजाओं से लड़नी पड़ी। इन सभी की कब्रें आज भी उक्त स्थान में देखने को मिलती है। 

निसंदेह गजनबी ने श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर को नष्ट किया। लेकिन भव्यता इतनी विशाल होने से वह श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर को जड़-मूल से नहीं मिटा पाया और ना ही धार्मिक हानि पहुंचा पाया।

इसके बाद भी वर्षों तक कई बार यवन बादशाहों ने धन एवं स्वर्ण रत्नों की अभिलाषा में श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर को क्षतिग्रस्त किया है। और कई बार हिंदू राजाओं द्वारा श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर का वापस पुनः निर्माण करवाया गया है। जिससे श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर का वैभव ज्यों का त्यों बना रहा है।

यह कथन सही है कि सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए। किंतु जो शासक या व्यक्ति इन बातों को नहीं मानता। क्या वह धर्म कर रहा है या अधर्म कर रहा है ?? जब धर्म अधर्म हो जाता है तब ही लड़ता है। विचार करना आवश्यक है।

इतने सारे आक्रमणों को झेलते हुये भी श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर अपने स्थान पर अडिग था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात तत्कालीन गृह मंत्री श्री सरदार वल्लभभाई पटेल, कन्हैयालाल जी माणिकलाल मुंशी, आदि प्रमुख नेताओं के द्वारा सार्थक प्रयासों से 11 मई 1951 में पुनः श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर का निर्माण करवाया गया और प्राण-प्रतिष्ठा विधि पूर्वक भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री डाॅ राजेन्द्र प्रसाद द्वारा किया गया।

नवीन श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर बिल्कुल प्राचीन मंदिर की कला के अनुरूप बनाया गया। जिसमें भव्य ज्योतिर्लिंग आज भी विराजमान है। पुराना प्राचीन ज्योतिर्लिंग मंदिर अभी भी समीप में ही स्थित है। श्रद्धालु वहां भी जाकर पूजा-अर्चना करते हैं।

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर की भव्यता आज भी वैसे ही है। जैसे प्राचीन काल में थी। सोमनाथ शिवलिंग की पूजा करने से चंद्र का श्राप खत्म हुआ था। चुंकि चंद्र ने यहां क्षय रोग से मुक्ति पाई थी। अतः लोगों का यह विश्वास है कि श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन एवं पूजन करने से प्राणियों को रोगों से मुक्ति मिलती है। 

भगवान के इस अद्भुत श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से पापों से मुक्ति मिलती है। प्राणी दोष मुक्त होकर स्वस्थ एवं खुशहाल जीवन व्यतीत करते हैं।

यह भी पढ़ें :
श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, आन्धप्रदेश (Mallikarjun Jyotirlinga, AndraPradesh) का इतिहास।

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर के निकट देखने योग्य स्थान :-


त्रिवेणी :- श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर के निकट त्रिवेणी नामक स्थान है। यहां प्राचीन अवशेष देखने को मिलते हैं। जो स्थान की प्राचीनता दर्शाते हैं। यहां एक सूर्य मंदिर भी स्थित है जिसके आसपास यादव स्थली है। यहां यादवों के बीच युद्ध का वर्णन मिलता है। जो आपस में साम्राज्य के लिए लड़ते थे।

सोमकुंड :- श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर के ही करीब एक भव्य कुंड है। जिसे सोमकुंड कहा जाता है। जनश्रुति के अनुसार माना जाता है कि यहां ब्रह्मा व शिव सदैव निवास करते हैं।

श्रीकृष्ण की प्रतिमा :- श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर जाने के रास्ते में एक स्थान ऐसा भी आता है। जहां भगवान श्रीकृष्ण को 
बहेलिये का बाण लगा था। यहां भगवान कृष्ण की प्रतिमा भी स्थापित है। सोमनाथ के पास ही भगवान कृष्ण की दाह-क्रिया वाला स्थान भी है।

भगवान सोमनाथ के वैभव व सम्पन्नता का कोई भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता। आध्यात्मिक शांति एवं आराधना का यह स्थान अतुलनीय है। 

कैसे पहुंचे श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर ? (How to Reach Shri Somnath Jyotirlinga Temple ?)


सड़क मार्ग द्वारा गुजरात की राजधानी अहमदाबाद से श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर की दूरी 412 किलोमीटर है। वही गुजरात के राजकोट से श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर सबसे निकट दूरी 198 किलोमीटर पर स्थित है। यदि आप द्वारिका की यात्रा पर निकले हैं। तो द्वारिका सेश्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर 235 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

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