Latest

10/recent/ticker-posts

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, आन्धप्रदेश (Mallikarjun Jyotirlinga, AndraPradesh)

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग अत्यंत पूजनीय एवं पापनाशक 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह प्रसिद्ध मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग भारत के राज्य आंध्रप्रदेश में स्थापित है।

इससे पहले हमने देखा 12 ज्योतिर्लिंग में प्रथम सोमनाथ ज्योतिर्लिंग है। 

अब हम बात करेंगे द्वितीय ज्योतिर्लिंग श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, आन्धप्रदेश (Mallikarjun Jyotirlinga, AndraPradesh) के बारे में सम्पूर्ण जानकारी।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, आंध्रप्रदेश राज्य के दक्षिणी भाग के कुर्नूल जिले में स्थित श्री शैलम पर्वत पर कृष्णा नदी के तट पर स्थापित है। और "दक्षिण के कैलाश" की उपाधि प्राप्त प्रसिद्ध सिद्ध स्थल है।

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, आन्धप्रदेश (Mallikarjun Jyotirlinga, AndraPradesh) का इतिहास -


मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का उल्लेख शिव पुराण के अनुसार एक पौराणिक कथा से माना जाता है। यह कथा भगवान शिव, माता पार्वती, श्रीगणेश और कार्तिकेय पर आधारित है। माना जाता है तभी से भगवान शिव उक्त स्थान पर मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग स्वरूप में हमेशा केे लिए स्थापित हो गए ।

स्कंद पुराण में भी ज्योतिर्लिंग का व्याख्यान मिलता है। स्कंद पुराण श्री शैल काण्ड में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग मंदिर का उल्लेख प्राप्त होता है।


विश्व के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के वर्णन अनुसार श्री शैल पर्वत पर भगवान शिव-पार्वती का पूजन करने से अश्वमेध यज्ञ करने जितना फल प्राप्त होता है। यहां भगवान के दर्शन मात्र से रोग और कष्ट दूर हो जाते हैं।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का इतिहास से जुड़े साक्ष्यों और प्राप्त सातवाहन राजवंश के शिलालेखों में वर्णन मिलता है कि मंदिर का आधार दूसरी शताब्दी में भी अस्तित्व में था। किंतु अधिकांश आधुनिक भाग विजयनगर के राजा हरिहर के काल से प्राप्त होता है।

जनश्रुति अनुसार आदि शंकराचार्य ने मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की यात्रा कर शिवनंद लहरी नामक ग्रंथ की रचना की थी।

तमिल के भी बहुत से सिद्ध संतों ने प्राचीन काल से ही इस ज्योतिर्लिंग की स्तुति की है।

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, आन्धप्रदेश (Mallikarjun Jyotirlinga, AndraPradesh) की पौराणिक कथा -


शिव पुराण के अनुसार मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की एक पौराणिक कथा है। जो अत्यंत रोचक व ज्ञानवर्धक है। कथा अनुसार सभी को पता है की आदिनाथ भगवान शिव के दो पुत्र थे, श्री गणेश और कार्तिकेय। दोनों ही पुत्र माता-पिता के प्यारे थे। माता पार्वती और पिता शिवजी दोनों के लिए समान स्नेह रखते थे।

जैसा कि समय एक जल की धारा के समान होता है। जो हमेशा प्रवाहमान रहता है। इसी तरह समय बीतता गया और दोनों पुत्र गणेश और कार्तिकेय जवान हो गए। अब माता-पिता को अपने पुत्रों के विवाह की चिंता सताने लगी।क्योंकि दोनों पुत्र माता-पिता की नजर में एक बराबर थे। तो माता-पिता के सामने प्रश्न उठा कि पहले शादी किसकी हो??

इस प्रश्न का उत्तर निकालने का एक प्रयास किया गया कि क्यों ना दोनों पुत्रों से पूछा जाए या फिर एक प्रतियोगिता आयोजित की जाए। दोनों पुत्रों से पूछा गया और प्रतियोगिता आयोजित की गई। 
प्रतियोगिता यह थी कि जो पुत्र सबसे पहले पृथ्वी का चक्कर लगाकर सर्वप्रथम वापस आएगा। उस पुत्र की शादी सबसे पहले की जावेगी। पुत्र गणेश और कार्तिकेय इस प्रतियोगिता के लिए तैयार थे।

प्रतियोगिता प्रारंभ होने ही वाली थी कि गणेश जी के मन में एक दुविधा और विचार उत्पन्न होता है। गणेश जी सोचते हैं कि मैं विशालकाय शरीर और बड़ी तोंदवाला होकर कैसे पृथ्वी के जल्दी चक्कर लगा सकता हूं। जबकि मेरा वाहन मूषक (चूहा) है। और कार्तिकेय का वाहन मोर। क्या मेरा वाहन मूषक मुझे सहायता कर पाएगा व पूरी यात्रा मेरा भार सह पाएगा??

इतने में प्रतियोगिता प्रारंभ होती है और कार्तिकेय मोर पर सवार हो उड़ जाते हैं। किंतु गणेश चतुर बुद्धि का उपयोग करके एक नया विकल्प ढूंढ निकालते हैं। गणेश अपने माता-पिता शिव-पार्वती की सात बार परिक्रमा लगाते हैं। सात परिक्रमा पूर्ण करने के बाद गणेश जी माता-पिता के सामने सर्वप्रथम पहुंच जाते हैं।


माता-पिता की परिक्रमा सबसे महान है क्योंकि माता-पिता ही पृथ्वी, आकाश, पाताल सब कुछ होते हैं। मां जीवन को उत्पन्न और पिता संचालन का करते हैं। माता-पिता ही ब्रह्मांड के बराबर है। जिसमें एक ग्रह पृथ्वी है। इस तरह गणेश जी की शादी पहले हो जाती है।

यहां कार्तिकेय अभी भी अपनी सवारी मोर पर पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए मार्ग में देवर्षि नारद से मिलते हैं। जहां देवर्षि नारद द्वारा गणेश का प्रथम आना और शादी होना कार्तिकेय को बताते हैं। 

कार्तिकेय यह सुन नाराज होकर कैलाश पर्वत त्याग कर चले जाते हैं। वे अपना नया निवास आंध्रप्रदेश की कृष्णा नदी के तट पर स्थित श्री शैल पर्वत पर बनाते हैं। 

भगवान शिव माता पार्वती को अपने पुत्र के ऐसे नाराज होकर जाने का बहुत दुख होता है और वे भी अपने पुत्र से मिलने श्री शैल पर्वत पर पहुंच जाते हैं।

कार्तिकेय को गुस्सा इतना था कि वह अपमानित महसूस कर रहे थे। माता-पिता के आने पर भी उनसे नहीं मिलते और भागकर श्री शैल पर्वत से दूर एक अन्य पर्वत पर जाकर छुप जाते हैं। चुंकि कार्तिकेय कुंवारे थे। तो यह स्थान "कुमार स्वामी" कहलाया।

भगवान शिव-पार्वती श्री शैल पर्वत पर अपने पुत्र की प्रतीक्षा करते रहे। और मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए। तभी से यह स्थान भगवान शिव-पार्वती का अतिरिक्त निवास स्थान बन गया। यहां भगवान शिव को 'अर्जुन' और माता पार्वती को 'मल्लिका' नाम की उपाधि से पूजा जाने लगा। 

चुंकि यहां शिव-पार्वती दोनों का प्रभाव रहा है एवं निवास स्थान रहा है। इस तरह मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का महत्व व पूजन अति महत्वपूर्ण और फलदायक सिद्ध हो गया।

शिवरात्रि के पावन पर्व पर मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग मंदिर में विशेष पूजन के साथ-साथ शिव-पार्वती के विवाह का आयोजन और महोत्सव मेला प्रतिवर्ष होता है।

श्री शैल पर्वत की एक विचित्र बात यह है कि यहां वृक्ष नहीं है। मंदिर पौराणिक दृश्यता और भव्यता दर्शाता है। मंदिर दक्षिणी कला की बेहतरीन प्रस्तुति देता है। मंदिर में प्रमुख शिखर है और साथ ही साथ आसपास कई अन्य शिव मंदिर भी स्थित है। जहां शिव वहां नंदी की भव्यता अतुलनीय है। मंदिर के द्वार सम्मुख बड़ी सी नंदी की प्रतिमा स्थापित है।


श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, आन्धप्रदेश (Mallikarjun Jyotirlinga, AndraPradesh) के निकट दर्शनीय स्थल -


मां पार्वती मंदिर - ज्योतिर्लिंग मंदिर के पीछे मां पार्वती मंदिर है। इन्हें मल्लिका देवी कहते हैं। सभा मंडप में नन्दी की विशाल मूर्ति है।

भ्रमराम्बा देवी मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग मंदिर से पश्चिम में 3.5 किलोमीटर पर भ्रमराम्बा देवी मंदिर है। यह 52 शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ मां सती की ग्रीवा गिरी थी।

पातालगंगामल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की पहाड़ी से पाँच किलोमीटर नीचे पातालगंगा के नाम से प्रसिद्ध कृष्णा नदी हैं, जिसमें स्नान करने का महत्त्व शास्त्रों में वर्णित है। इसका मार्ग कठिन और जंगल से गुजरता है। 852 सीढ़ियाँ हैं। अब यात्री मोटर बस से 5-6 किलोमीटर आकर कृष्णा में स्नान कर सकते हैं।

शिखरेश्वर मंदिर - ज्योतिर्लिंग से करीब 10 किलोमीटर पर शिखरेश्वर तथा हाटकेश्वर मंदिर है। यह मार्ग बहुत कठिन है।

विल्वन- शिखरेश्वर मंदिर से 10 किलोमीटर की दूरी पर एकम्मा देवी का मंदिर भी घोर वन में है। यहाँ मार्ग दर्शक एवं सुरक्षा के बिना यात्रा करना संभव नहीं है। हिंसक पशु इधर वन में बहुत दिख जाते हैं।

कैसे पहुंचे श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, आन्धप्रदेश (Mallikarjun Jyotirlinga, AndraPradesh) मंदिर -

सड़क मार्ग से हैदराबाद, तिरुपति, विजयवाड़ा और अनन्तपुर से नियमित सरकारी व निजी बसें मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के लिए चलती है। 

हैदराबाद से मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की दूरी 213 किलोमीटर है।

रेलमार्ग का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन मार्कापूर रोड है। जिससे 60 किलोमीटर की दूरी पर श्री शैलम है। यहां भी स्टेशन से मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के लिये बस और टैक्सी दोनों की सुविधा मिल जाती है।

वायु मार्ग से हैदराबाद का राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पहुंचा जा सकता है। फिर सड़क मार्ग से बस और टैक्सी दोनों ही मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के लिए उपलब्ध रहती है।

यह भी पढ़ें-
- चमत्कारिक श्री हनुमान मंदिर, जामसांवली, सौंसर, छिंदवाड़ा
- राक पेंटिंग्स/भित्तिचित्र/गुफा चित्र, तामिया(जिला - छिंदवाड़ा)
- देवगढ़ का किला, छिंदवाड़ा (म.प्र.) - एक किले की अनकही कहानी ।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ